गधे………..


जिधर देखते हैं उधर ही गधे हैं
कोई छोटे-मोटे तो कोई बड़े हैं
हैं बैठे हुए कोई, कोई खड़े हैं
मगर सबके कंधों पे बोरे लदे हैं
सड़क पर हो गोया गधों का ही रेला
कोई कह रहा मीठा कोई विषैला
गधे हैं बड़े काम के जानते हैं
हो दफ्तर या घर इसको पहचानते हैं
बड़े हो या छोटे सभी मानते हैं
इसे घास देकर सभी छानते हैं
गधे आजकल काम भी कर रहे हैं
विदेशों में यह नाम भी कर रहे हैं
सभी के दुलारे गधे हो गए हैं
गधों के लिए चैन भी खो गए हैं
हर एक जान थक-हार कर सो गए हैं
मगर ये गधे हैं सभी धो गए हैं
गधे रात-दिन कर रहे हैं बहुत काम
तभी तो गधों को ही मिलता है इन’आम
गधा है तो हर काम होता है आसान
गधों से ही बनती है लोगों की पहचान
गधों से है ‘इज़्ज़त गधों से ही है शान
बिना उनके हर कोई हो जाते हैं बे-जान
सदा मालिकों को गधे रखते हैं खुश
हो डोनाल्ड या हो नितन्याहू कि बुश
सुना है गधे भोंकने भी लगे हैं
ये इनसां को अब काटने भी लगे हैं
सबक मुफ़्त में बांटने भी लगे हैं
घड़ी-दो-घड़ी डांटने भी लगे हैं
गधे भी अगर गुनगुनाने लगेंगे
तो कितने ‘मुजाहिद’ ठिकाने लगेंगे
By Mojahidul Islam , Godda
